तेरे लिए,
कुछ खामोश पन्ने
मैं हर रोज लिखती हूँ
कि जब तू मिलेगा,
तो
थमा दूगी तुझे
तेरी अमानत
Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts
Tuesday, February 15, 2011
Saturday, November 27, 2010
विराम
जीवन की इस पंक्ति पर
विराम लग गया है
इस ओर या उस ओर
कहीं तो होगा
इस जीवन का अर्थ
जो कुछ चिन्हों की सीमाओ में बंधा
सिर्फ देखता है मुझे
इस अर्थ का विस्तार चाहती हूँ
उस क्षितिज से भी दूर,
आकाश से ऊँचा,
प्रथ्वी से विस्तृत
सम्पूर्णता की कोई चाह नही ,
बस इतना भर,
अपने हिस्से का आकाश,
अपने हिस्से की जमीं,
जो सिर्फ मेरी हो
....... मेरी हो
Saturday, September 25, 2010
गुस्सा
जानते हो,
कभी-कभी
मन करता है कि
बच्चो जैसी लडाई कर लू तुम से,
कुट्टी-पुच्ची वाली
वापस कर दूँ तुम्हारी चीजे
और
मांग लूँ अपनी हर चीज
थोडा सा अपना मुहं फुलाकर
कहूँ तुम से
"नहीं बोलती तुम से
खूब ......
गुस्सा हूँ "
पर जानती हूँ
इस सब के बावजूद भी,
तुम हमेशा की तरह
गंभीर होकर,
मुस्करा कर चले जाओगे
और
छोड़ जाओगे
मुझे
ढेर सारे सवालों-जबाबों के बीच
कभी-कभी
मन करता है कि
बच्चो जैसी लडाई कर लू तुम से,
कुट्टी-पुच्ची वाली
वापस कर दूँ तुम्हारी चीजे
और
मांग लूँ अपनी हर चीज
थोडा सा अपना मुहं फुलाकर
कहूँ तुम से
"नहीं बोलती तुम से
खूब ......
गुस्सा हूँ "
पर जानती हूँ
इस सब के बावजूद भी,
तुम हमेशा की तरह
गंभीर होकर,
मुस्करा कर चले जाओगे
और
छोड़ जाओगे
मुझे
ढेर सारे सवालों-जबाबों के बीच
Sunday, September 5, 2010
द्वीप
"मैं द्वीप होना चाहती हूँ ,
तेरे सागर का ,
जो तेरा होकर भी ,
तेरा नही हैं "
तेरे सागर का ,
जो तेरा होकर भी ,
तेरा नही हैं "
Sunday, July 25, 2010
बेटी की पहली कमाई माँ के लिए
बेटी
जब तुम
कमाना
अपना पैसा
तो मुझे बस खरीद देना
दो रंग
एक हरा
एक नीला
मेरे जीवन के ये रंग सूख गये है
चूल्हे कि कालिख ने मुझ में
भर दिया है कालापन
और
तुम सब के सपनों में रंग भरते भरते
मैं अब
बे-रंग हो चली हूँ
जब तू खरीद देगी मुझे ये रंग
तो मैं भी
धरती कि हरियाली
और
आसमान के नीले विस्तार को
कुछ दिन ही सही
पर
जी तो लूगी
जब तुम
कमाना
अपना पैसा
तो मुझे बस खरीद देना
दो रंग
एक हरा
एक नीला
मेरे जीवन के ये रंग सूख गये है
चूल्हे कि कालिख ने मुझ में
भर दिया है कालापन
और
तुम सब के सपनों में रंग भरते भरते
मैं अब
बे-रंग हो चली हूँ
जब तू खरीद देगी मुझे ये रंग
तो मैं भी
धरती कि हरियाली
और
आसमान के नीले विस्तार को
कुछ दिन ही सही
पर
जी तो लूगी
Sunday, May 23, 2010
महक
एक बार की ही तो,
चाहत थी उस की
मेरे बालो को अंजुरी में भर
सूंघ लेने की
और
बस दो पल ही
उस की लम्बी सांसे
मेरी खुशबू को पीती रही
उस के बाद
जब-जब ये जुल्फे खुली
तो
उस की सांसो की महक से
महकाती रही मुझे
चाहत थी उस की
मेरे बालो को अंजुरी में भर
सूंघ लेने की
और
बस दो पल ही
उस की लम्बी सांसे
मेरी खुशबू को पीती रही
उस के बाद
जब-जब ये जुल्फे खुली
तो
उस की सांसो की महक से
महकाती रही मुझे
Saturday, May 15, 2010
गणित
कुछ सपने हैं
तेरे और मेरे बीच,
जो कभी हंसाते है
तो कभी रुलाते भी
पर अक्सर ये खामोश कर जाते है तुझ को
तू उलझ जाता है इन
सपनो के गणित में
और
तब दो -दो चार के योग से बाहर हो जाता है
इन सारे सपनो का भूगोल
तेरे और मेरे बीच,
जो कभी हंसाते है
तो कभी रुलाते भी
पर अक्सर ये खामोश कर जाते है तुझ को
तू उलझ जाता है इन
सपनो के गणित में
और
तब दो -दो चार के योग से बाहर हो जाता है
इन सारे सपनो का भूगोल
Sunday, May 9, 2010
पूंजी
हम दो किनारे
अलग -अलग,
पर साथ चलते हुए
मैं अक्सर अपनी सीमा छोड़,
तुम में मिलना चाहती
और तुम
मेरे आने को देखते बस,
ना स्वागत,ना तिरस्कार
मैं कुछ देर ठहरती तुम्हारे पास
अपनी ख़ुशी के लिए
वापस आती तो साथ लाती
ढेर सारा दुःख
जो तुमने चलते वक़्त
मेरी झोली में भर दिये थे
हंसकर, कहते हुए
संभाल कर रखना
इन्हे
ये ही तेरी पूंजी है
अलग -अलग,
पर साथ चलते हुए
मैं अक्सर अपनी सीमा छोड़,
तुम में मिलना चाहती
और तुम
मेरे आने को देखते बस,
ना स्वागत,ना तिरस्कार
मैं कुछ देर ठहरती तुम्हारे पास
अपनी ख़ुशी के लिए
वापस आती तो साथ लाती
ढेर सारा दुःख
जो तुमने चलते वक़्त
मेरी झोली में भर दिये थे
हंसकर, कहते हुए
संभाल कर रखना
इन्हे
ये ही तेरी पूंजी है
Friday, April 23, 2010
अनकहा
अपनी
मौन सांसे
तुम को देना चाहती हूँ,
कि तुम,
इन्हे शब्द देकर,
स्वर देकर,
रंग देकर
दे दो इन्हे
एक नया अर्थ,
एक नयी लय,
एक नया रूप,
और
वो भी
जो इन सब के बीच भी
अनकहा सा रह जाता है
मौन सांसे
तुम को देना चाहती हूँ,
कि तुम,
इन्हे शब्द देकर,
स्वर देकर,
रंग देकर
दे दो इन्हे
एक नया अर्थ,
एक नयी लय,
एक नया रूप,
और
वो भी
जो इन सब के बीच भी
अनकहा सा रह जाता है
Monday, April 5, 2010
कौन हो तुम
कौन हो तुम
मेरे
भूत, वर्तमान या भविष्य
जो था कल
उस में तो नही हो तुम,
जो चल रहा है,
वहाँ भी नही हो तुम
और
जो कल होगा
वहाँ भी नही होगे तुम
फिर
ये धड़कन
ये साँस
क्यों कहती है मुझसे
कि
तुम हो
पल-पल,हर -पल
मेरे
भूत, वर्तमान या भविष्य
जो था कल
उस में तो नही हो तुम,
जो चल रहा है,
वहाँ भी नही हो तुम
और
जो कल होगा
वहाँ भी नही होगे तुम
फिर
ये धड़कन
ये साँस
क्यों कहती है मुझसे
कि
तुम हो
पल-पल,हर -पल
Monday, March 29, 2010
नींद
कोरी- सी ये रात,
तेरी नींद के सिरहाने रख आई थी मैं,
जब जागना तो इसे भी,
थोडा-सा उनींदा सा कर देना
तेरी नींद के सिरहाने रख आई थी मैं,
जब जागना तो इसे भी,
थोडा-सा उनींदा सा कर देना
Wednesday, March 17, 2010
जस -का -तस
ढलता सूरज,
फीकी कड़क -चाय
और
सूनी सी- छत
अब भी सब कुछ वैसा ही है
पर,
ये सब बिना किसी आहट के,
बस गुजर भर जाते है दिनचर्या में
मन का शोर
इन्हे अनसुना कर
अपनी ही धुन में
धडकता है,
और
वहां
सूरज
चाय
छत
सब कुछ
जस का तस है
फीकी कड़क -चाय
और
सूनी सी- छत
अब भी सब कुछ वैसा ही है
पर,
ये सब बिना किसी आहट के,
बस गुजर भर जाते है दिनचर्या में
मन का शोर
इन्हे अनसुना कर
अपनी ही धुन में
धडकता है,
और
वहां
सूरज
चाय
छत
सब कुछ
जस का तस है
Monday, March 8, 2010
औरत :एक प्रेरणा
मैंने,
स्थगित कर रखी है,
कुछ यात्राए
और चोराहे पर खड़े हो
पढ़ रही हूँ रास्तो को
हर आने जाने वाले से
गर्म जोशी से हाथ मिलाती हूँ
अनुभव करती हूँ
उनकी थकान,
और
बस सहला देती हूँ पीठ
कि चलो,
आगे बढ़ो,
फिर किसी और
चोराहे पर मिलूंगी
तुम्हे
उम्मीदों का दामन पकडे
स्थगित कर रखी है,
कुछ यात्राए
और चोराहे पर खड़े हो
पढ़ रही हूँ रास्तो को
हर आने जाने वाले से
गर्म जोशी से हाथ मिलाती हूँ
अनुभव करती हूँ
उनकी थकान,
और
बस सहला देती हूँ पीठ
कि चलो,
आगे बढ़ो,
फिर किसी और
चोराहे पर मिलूंगी
तुम्हे
उम्मीदों का दामन पकडे
Friday, March 5, 2010
विकल्प
कल कहा था उसने
कि मेरा कोई विकल्प ढूंढ़ लो,
जीना आसान हो जायेगा
सुना और मुस्करायी थी मैं,
क्या इसे पता नही
कि औरत के जीवन के,
विकल्प ही है,
ये
चुप्पी और आंसू
कि मेरा कोई विकल्प ढूंढ़ लो,
जीना आसान हो जायेगा
सुना और मुस्करायी थी मैं,
क्या इसे पता नही
कि औरत के जीवन के,
विकल्प ही है,
ये
चुप्पी और आंसू
Thursday, March 4, 2010
जीवन
सुनो,
तुम क्या लौटा सकते हो,
मुझे
वो सब
जिसे मैंने जिया था,
जाना था,
जैसे,
पल -पल में एक जीवन
Friday, February 19, 2010
वक़्त
वक़्त ने छोड़ दिया था
जिन हाथो का साथ,
आज वक़्त से लड़कर,
उन्हें जिन्दगी भर का
'हम साथ 'बनाया है
जिन हाथो का साथ,
आज वक़्त से लड़कर,
उन्हें जिन्दगी भर का
'हम साथ 'बनाया है
सच
दिल का रेशा -रेशा जो कहता है
वो झूठ है
तेरी आँखे और सांसे
जो कहती है
वो भी एक झूठ है
तो चलो ना
अब
वही मान ले
जो सब ने कहा
कि
यही सच है
वो झूठ है
तेरी आँखे और सांसे
जो कहती है
वो भी एक झूठ है
तो चलो ना
अब
वही मान ले
जो सब ने कहा
कि
यही सच है
Monday, January 18, 2010
मादा
सिकुड़ जाती हूँ
अक्सर
इस 'साये' में
जो चलता रहता साथ मेरे
हर दम, हर जगह
कभी महसूस करना तुम भी
'ऑरत' के
इस साये को
जो गाहे-बगाहे निरीह बनाता है मुझे
मेरी आत्मा से अलग मेरा शरीर
दबोचता,
मसलता,
कचोटता रहता है
कि
तुम
सिर्फ
'मादा' हो
अक्सर
इस 'साये' में
जो चलता रहता साथ मेरे
हर दम, हर जगह
कभी महसूस करना तुम भी
'ऑरत' के
इस साये को
जो गाहे-बगाहे निरीह बनाता है मुझे
मेरी आत्मा से अलग मेरा शरीर
दबोचता,
मसलता,
कचोटता रहता है
कि
तुम
सिर्फ
'मादा' हो
Friday, January 15, 2010
भवंर
रोज मेरे साथ चलता था,
ये दर्द
मैंने कहा,
दोस्त बन जाओ मेरे,
बस,
रहो मेरे साथ,
चलो मेरे साथ,
जियो मेरे साथ।
पर,
ये दर्द
मेरे वजूद से ज्यादा ताकतवर था,
साथी से स्वामी हो गया,
और अब
मेरे वजूद में एक,
भवंर पैदा
किये रहता है
Subscribe to:
Posts (Atom)