मैंने,
स्थगित कर रखी है,
कुछ यात्राए
और चोराहे पर खड़े हो
पढ़ रही हूँ रास्तो को
हर आने जाने वाले से
गर्म जोशी से हाथ मिलाती हूँ
अनुभव करती हूँ
उनकी थकान,
और
बस सहला देती हूँ पीठ
कि चलो,
आगे बढ़ो,
फिर किसी और
चोराहे पर मिलूंगी
तुम्हे
उम्मीदों का दामन पकडे
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Monday, March 8, 2010
Friday, March 5, 2010
विकल्प
कल कहा था उसने
कि मेरा कोई विकल्प ढूंढ़ लो,
जीना आसान हो जायेगा
सुना और मुस्करायी थी मैं,
क्या इसे पता नही
कि औरत के जीवन के,
विकल्प ही है,
ये
चुप्पी और आंसू
कि मेरा कोई विकल्प ढूंढ़ लो,
जीना आसान हो जायेगा
सुना और मुस्करायी थी मैं,
क्या इसे पता नही
कि औरत के जीवन के,
विकल्प ही है,
ये
चुप्पी और आंसू
Monday, January 18, 2010
मादा
सिकुड़ जाती हूँ
अक्सर
इस 'साये' में
जो चलता रहता साथ मेरे
हर दम, हर जगह
कभी महसूस करना तुम भी
'ऑरत' के
इस साये को
जो गाहे-बगाहे निरीह बनाता है मुझे
मेरी आत्मा से अलग मेरा शरीर
दबोचता,
मसलता,
कचोटता रहता है
कि
तुम
सिर्फ
'मादा' हो
अक्सर
इस 'साये' में
जो चलता रहता साथ मेरे
हर दम, हर जगह
कभी महसूस करना तुम भी
'ऑरत' के
इस साये को
जो गाहे-बगाहे निरीह बनाता है मुझे
मेरी आत्मा से अलग मेरा शरीर
दबोचता,
मसलता,
कचोटता रहता है
कि
तुम
सिर्फ
'मादा' हो
Friday, January 15, 2010
भवंर
रोज मेरे साथ चलता था,
ये दर्द
मैंने कहा,
दोस्त बन जाओ मेरे,
बस,
रहो मेरे साथ,
चलो मेरे साथ,
जियो मेरे साथ।
पर,
ये दर्द
मेरे वजूद से ज्यादा ताकतवर था,
साथी से स्वामी हो गया,
और अब
मेरे वजूद में एक,
भवंर पैदा
किये रहता है
Thursday, January 14, 2010
मासिक- धर्म
सुनो,
मैं
तुम्हें बताना चाहती हूँ
अपने शरीर की रिसती एक -एक बूंद का दर्द
दर्द,
जो तुम्हारे लिए इतना ही है,
कि जिसे सुन लिया जाये,
एक हाँ, हूँ के साथ
और मैं,
इस बूंद- बूंद बहती नदी को,
जीती हूँ,
दिन -व -दिन,
महीने -दर- महीने
यह एक बूंद,
मुझे जोडती भी है तुम से,
और दूर भी करती है,
मीलों तक
लेकिन,
कभी अगर इस दर्द की भाषा समझ सको,
तो जरुर आना,
इन मीलों की दूरी को तय कर के,
प्यार से सर पर हाथ रखने
दूसरी
तुम प्रेम की एक और नई परिभाषा गढ़ो,
जिसमे ठीक- ठीक बैठा सको मुझे,
कि मैं,
तुम्हारा 'दूसरा' प्रेम हूँ
जिसे तुमने गाहे -बेगाहें स्वीकार किया है
वैसे भी,
इस दूसरे के लिए तुम्हें 'सब कुछ' नया गढ़ना होगा,
क्योंकि,
हमारी सभ्यता ने तो इस दूसरी के लिए कुछ रखा ही नही है
यहाँ सब कुछ 'पहले ' के लिए ही आरक्षित है,
प्यार,
सम्मान,
और
रिश्ता भी
पहले के बाद जो भी,जैसा भी है,
सब 'अनैतिक' है
तो दोस्त,
मत सर- दर्द लो तुम,
और छोड़ दो मुझे,
किसी और का
'पहला' बनने के लिए
जिसमे ठीक- ठीक बैठा सको मुझे,
कि मैं,
तुम्हारा 'दूसरा' प्रेम हूँ
जिसे तुमने गाहे -बेगाहें स्वीकार किया है
वैसे भी,
इस दूसरे के लिए तुम्हें 'सब कुछ' नया गढ़ना होगा,
क्योंकि,
हमारी सभ्यता ने तो इस दूसरी के लिए कुछ रखा ही नही है
यहाँ सब कुछ 'पहले ' के लिए ही आरक्षित है,
प्यार,
सम्मान,
और
रिश्ता भी
पहले के बाद जो भी,जैसा भी है,
सब 'अनैतिक' है
तो दोस्त,
मत सर- दर्द लो तुम,
और छोड़ दो मुझे,
किसी और का
'पहला' बनने के लिए
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