इतना ही तो कहा था
जाओ
मुक्त हो तुम
निरासक्त
निर्द्वन्द
निर्भय
और
तुम लौट आये
मेरे ही आँचल में,
पलकों की कोर में ,
बाहों के समुन्दर में
दरसल,
ये दूरिया और नजदिकिया थी
मेरे और तेरे वजूद की
जो कभी सीप होना चाहती थी
तो कभी बूंद
Thursday, August 12, 2010
Sunday, July 25, 2010
बेटी की पहली कमाई माँ के लिए
बेटी
जब तुम
कमाना
अपना पैसा
तो मुझे बस खरीद देना
दो रंग
एक हरा
एक नीला
मेरे जीवन के ये रंग सूख गये है
चूल्हे कि कालिख ने मुझ में
भर दिया है कालापन
और
तुम सब के सपनों में रंग भरते भरते
मैं अब
बे-रंग हो चली हूँ
जब तू खरीद देगी मुझे ये रंग
तो मैं भी
धरती कि हरियाली
और
आसमान के नीले विस्तार को
कुछ दिन ही सही
पर
जी तो लूगी
जब तुम
कमाना
अपना पैसा
तो मुझे बस खरीद देना
दो रंग
एक हरा
एक नीला
मेरे जीवन के ये रंग सूख गये है
चूल्हे कि कालिख ने मुझ में
भर दिया है कालापन
और
तुम सब के सपनों में रंग भरते भरते
मैं अब
बे-रंग हो चली हूँ
जब तू खरीद देगी मुझे ये रंग
तो मैं भी
धरती कि हरियाली
और
आसमान के नीले विस्तार को
कुछ दिन ही सही
पर
जी तो लूगी
Thursday, July 8, 2010
खालीपन
कुछ भर जाता है वो मुझ में ,
क्या है ये,नही जानती
पर जो भी है वो बूंद -बूंद नही ,
सागर -सागर सा लगता है
Wednesday, May 26, 2010
Sunday, May 23, 2010
महक
एक बार की ही तो,
चाहत थी उस की
मेरे बालो को अंजुरी में भर
सूंघ लेने की
और
बस दो पल ही
उस की लम्बी सांसे
मेरी खुशबू को पीती रही
उस के बाद
जब-जब ये जुल्फे खुली
तो
उस की सांसो की महक से
महकाती रही मुझे
चाहत थी उस की
मेरे बालो को अंजुरी में भर
सूंघ लेने की
और
बस दो पल ही
उस की लम्बी सांसे
मेरी खुशबू को पीती रही
उस के बाद
जब-जब ये जुल्फे खुली
तो
उस की सांसो की महक से
महकाती रही मुझे
Saturday, May 15, 2010
गणित
कुछ सपने हैं
तेरे और मेरे बीच,
जो कभी हंसाते है
तो कभी रुलाते भी
पर अक्सर ये खामोश कर जाते है तुझ को
तू उलझ जाता है इन
सपनो के गणित में
और
तब दो -दो चार के योग से बाहर हो जाता है
इन सारे सपनो का भूगोल
तेरे और मेरे बीच,
जो कभी हंसाते है
तो कभी रुलाते भी
पर अक्सर ये खामोश कर जाते है तुझ को
तू उलझ जाता है इन
सपनो के गणित में
और
तब दो -दो चार के योग से बाहर हो जाता है
इन सारे सपनो का भूगोल
Sunday, May 9, 2010
पूंजी
हम दो किनारे
अलग -अलग,
पर साथ चलते हुए
मैं अक्सर अपनी सीमा छोड़,
तुम में मिलना चाहती
और तुम
मेरे आने को देखते बस,
ना स्वागत,ना तिरस्कार
मैं कुछ देर ठहरती तुम्हारे पास
अपनी ख़ुशी के लिए
वापस आती तो साथ लाती
ढेर सारा दुःख
जो तुमने चलते वक़्त
मेरी झोली में भर दिये थे
हंसकर, कहते हुए
संभाल कर रखना
इन्हे
ये ही तेरी पूंजी है
अलग -अलग,
पर साथ चलते हुए
मैं अक्सर अपनी सीमा छोड़,
तुम में मिलना चाहती
और तुम
मेरे आने को देखते बस,
ना स्वागत,ना तिरस्कार
मैं कुछ देर ठहरती तुम्हारे पास
अपनी ख़ुशी के लिए
वापस आती तो साथ लाती
ढेर सारा दुःख
जो तुमने चलते वक़्त
मेरी झोली में भर दिये थे
हंसकर, कहते हुए
संभाल कर रखना
इन्हे
ये ही तेरी पूंजी है
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